शोला हूँ, भड़कने की – Shola Hoon Bhadakne Ki – ഗസൽ – Ghazal (Jagjit Singh)

शोला हूँ, भड़कने की गुजारीश नहीं करता
सच मुँह से निकल जाता है, कोशिश नहीं करता

गिरती हुई दीवार का हमदर्द हूँ लेकिन
चढ़ते हुए सूरज की परस्तिश नहीं करता

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